आजमगढ़। एक तरफ जहाँ सरकारी कागजों और मंचों से खेल प्रतिभाओं को निखारने और “खिलाड़ियों की नर्सरी” तैयार करने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोल रही है। आजमगढ़ जिले के परिषदीय विद्यालयों में बुनियादी खेल सुविधाओं का भारी अकाल पड़ा हुआ है।
ताज़ा आंकड़ों और ज़मीनी पड़ताल के मुताबिक, ज़िले के करीब 50 प्रतिशत स्कूलों में न तो बच्चों के खेलने के लिए खेल का मैदान है और न ही उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए खेल शिक्षक (शारीरिक शिक्षक) तैनात हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण जूनियर हाई स्कूल गनपतपुर में देखने को मिलता है, जहाँ खेलकूद के मैदान का पूरी तरह से अभाव है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि खेल सामग्री और खेलकूद के विकास के नाम पर हर साल बजट तो आवंटित किया जाता है, लेकिन धरातल पर बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नसीब नहीं हो रही हैं। जब प्रारंभिक स्तर पर ही मैदान और खेल शिक्षक मौजूद नहीं होंगे, तो ग्रामीण अंचल की प्रतिभाएं आखिर राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कैसे बना पाएंगी?
प्रशासनिक अनदेखी के चलते बच्चों का शारीरिक विकास और खेल के प्रति रुझान स्कूल की चारदीवारी तक ही सीमित होकर रह गया है। क्या आपको लगता है कि बिना बुनियादी सुविधाओं और खेल शिक्षकों के ग्रामीण इलाकों से नए खिलाड़ी निकल सकते हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।
