Sat, Nov 7, 2026 Updated 10:09 PM IST
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आजमगढ़ में साइबर ठगों ने उड़ाए 8 करोड़: 10 महीने में 200 बड़ी वारदातें, बैंक और पुलिस के बीच फंसे पीड़ित, जानें क्या है पूरी हकीकत

1 week पहले

आजमगढ़। जिले में साइबर अपराधियों का जाल इस कदर फैल चुका है कि आम जनता की गाढ़ी कमाई पर हर पल खतरा मंडरा रहा है। “आजमगढ़ टाइम्स” की पड़ताल में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। पिछले मात्र 10 महीनों के भीतर जिले में साइबर ठगी की 200 से अधिक बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया गया है, जिनमें ठगों ने लगभग 8 करोड़ रुपये पार कर दिए हैं। हालांकि, पुलिस की साइबर सेल ने तत्परता दिखाते हुए करीब 7 करोड़ रुपये होल्ड तो करा दिए, लेकिन बैंकों की सुस्त प्रक्रिया के चलते अब तक पीड़ितों के खातों में महज 80 लाख रुपये ही वापस लौट पाए हैं।

पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, बड़ी वारदातों के अलावा छोटी ठगी के मामलों में पुलिस ने कड़ी मशक्कत की है। लगभग 2000 ऐसे पीड़ित हैं, जिन्हें 500 से लेकर 20 हजार रुपये तक की रकम वापस दिलाई गई है। जांच में यह बात सामने आई है कि जिले में सबसे अधिक शाखाओं वाले यूनियन बैंक के खाताधारक ठगों के आसान निशाने पर हैं। विडंबना यह है कि ठगी का शिकार होने के बाद पीड़ित जब मदद की गुहार लेकर बैंक पहुंचता है, तो उसे अक्सर पुलिस के पास भेज दिया जाता है, और पुलिस से फिर बैंक के चक्कर कटवाए जाते हैं।

बैंकों की लापरवाही और “म्यूल खातों” का मायाजाल
खबर की गहराई में जाएं तो पता चलता है कि रिकवरी में देरी का सबसे बड़ा कारण बैंकों से मिलने वाले “देर से अलर्ट” हैं। कई मामलों में, विशेषकर एसबीआई (SBI) के ग्राहकों ने शिकायत की है कि खाते से पैसे कटने का मैसेज 5 मिनट से लेकर 1 घंटे की देरी से आता है, जबकि बैंक इसके लिए बाकायदा शुल्क वसूलते हैं। इसी देरी का फायदा उठाकर ठग पैसे को दूसरे खातों में ट्रांसफर कर देते हैं। पुलिस ने अहरौला और गंभीरपुर जैसे इलाकों में “म्यूल खातों” (किराए के खाते) पर स्ट्राइक की है। अहरौला में पकड़े गए चार आरोपियों के खातों से कथित तौर पर 448 साइबर शिकायतें जुड़ी थीं और 40 लाख की ठगी का सुराग मिला था।

पीड़ितों की जुबानी: सिस्टम की मार
ठगी का दर्द झेल रहे फूलपुर के कौड़िया निवासी प्रमोद यादव बताते हैं कि क्रेडिट कार्ड चालू करने के नाम पर उनसे 60 हजार रुपये की ठगी हुई थी। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद एक महीने में उनके पैसे वापस मिले। वहीं, रौनापार की एक महिला ने स्पीड पोस्ट ट्रैक करने के चक्कर में एक संदिग्ध लिंक पर क्लिक किया और उनके 81 हजार रुपये कट गए। पुलिस ने 27 हजार रुपये होल्ड तो कराए, लेकिन बैंक से अब तक केवल 5 हजार रुपये ही वापस मिल सके हैं।

क्या कहता है कानून और बचाव के तरीके?
नियमों के अनुसार, यदि ठगी बैंक की सुरक्षा चूक या डेटा लीक के कारण हुई है (अनाधिकृत लेनदेन), तो उसकी पूरी भरपाई की जिम्मेदारी बैंक की होती है। लेकिन यदि ग्राहक ने खुद किसी लालच में आकर ओटीपी या लिंक साझा किया है, तो बैंक पल्ला झाड़ लेते हैं। साइबर सेल ने सलाह दी है कि किसी भी संदिग्ध कॉल या लिंक पर भरोसा न करें। ठगी होते ही तुरंत 1930 पर कॉल करें और बैंक को सूचित कर ट्रांजेक्शन रुकवाएं।

आजमगढ़ टाइम्स का सवाल: क्या आपको लगता है कि साइबर ठगी के मामलों में बैंक अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं? क्या बैंकों को मैसेज अलर्ट सिस्टम और सुरक्षा को और कड़ा करने की जरूरत है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।

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