आजमगढ़: बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का महापर्व विजयादशमी पूरे जनपद में भारी उत्साह और पारंपरिक श्रद्धा के साथ मनाया गया। जिले की ऐतिहासिक पुरानी कोतवाली स्थित श्रीरामलीला के मैदान में जब मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने तरकश से अग्निबाण छोड़ा, तो पूरा परिसर गूंज उठा। जैसे ही यह बाण रावण के पुतले को लगा, दशानन का विशालकाय पुतला धू-धूकर जल उठा और बुराई का प्रतीक राख में तब्दील हो गया।
आंकड़ों में दशहरा: आजमगढ़ टाइम्स के पास मौजूद आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इस साल पूरे जिले में सुरक्षा और परंपरा के बीच कुल 155 स्थानों पर रावण दहन का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसके साथ ही, जनपद के विभिन्न विसर्जन घाटों पर करीब 1748 दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन भी पूरी आस्था और सुरक्षा व्यवस्था के साथ संपन्न हुआ।
31 वर्षों की अटूट परंपरा: पुरानी कोतवाली रामलीला समिति के संयोजक विभाष सिन्हा ने बताया कि यहाँ रामलीला का इतिहास बेहद गौरवशाली और प्राचीन है। वर्तमान आयोजन समिति वर्ष 1996 से लगातार इस भव्य मंचन का दायित्व निभा रही है, जिसका यह 31वां वर्ष था। सिन्हा के अनुसार, “रामलीला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश है कि जब-जब आसुरी शक्तियां प्रबल होंगी, तब-तब प्रभु श्रीराम के आदर्शों से उनका अंत होगा।”
प्रशासन रहा अलर्ट: त्योहार के दौरान शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद नजर आया। पुरानी कोतवाली से लेकर श्री हनुमानगढ़ी रामलीला तक, हर जगह भारी पुलिस बल तैनात रहा। वरिष्ठ अधिकारियों ने खुद मोर्चा संभालते हुए भीड़ को नियंत्रित किया और विसर्जन मार्गों पर पैनी नजर रखी, ताकि उत्सव में कोई खलल न पड़े।
अधर्म पर धर्म की विजय: पुतला दहन के बाद लोगों ने एक-दूसरे को गले मिलकर विजयादशमी की बधाई दी। रामलीला समितियों का कहना है कि रावण दहन यह याद दिलाता है कि इंसान को हमेशा सच्चाई और नेकी के रास्ते पर चलना चाहिए और किसी को पीड़ा नहीं पहुंचानी चाहिए।
आजमगढ़ टाइम्स आपसे पूछता है: क्या आपको लगता है कि आज के आधुनिक युग में रावण के पुतले के साथ-साथ हमें अपने भीतर छिपे भ्रष्टाचार, ईर्ष्या और नफरत जैसे ‘मानसिक रावण’ का भी दहन करना चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दें।